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केरल की कसावु साड़ी के सुनहरे बॉर्डर में छिपा है खास राज, जानिए सदियों पुरानी इस परंपरा की कहानी

भारतीय परिधानों की खूबसूरती उनकी बनावट के साथ-साथ उनसे जुड़ी परंपराओं में भी छिपी होती है। केरल की पारंपरिक कसावु साड़ी इसकाखूबसूरत उदाहरण है। ऑफ-व्हाइट या क्रीम रंग का सूती कपड़ा और किनारों पर चमकता सुनहरा बॉर्डर इसे बाकी साड़ियों से अलग पहचान देता है।ओणम, विशु, शादियों और दूसरे शुभ अवसरों पर पहनी जाने वाली यह साड़ी अपनी सादगी में भी शाही अंदाज दिखाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके सुनहरे बॉर्डर को इतना खास क्यों माना जाता है?

दरअसल, ‘कसावु’ शब्द पारंपरिक रूप से साड़ी के सुनहरे बॉर्डर में इस्तेमाल होने वाली जरी से जुड़ा है। पुराने समय में जरी बनाने के लिए चांदी केबारीक तारों पर सोने की परत चढ़ाई जाती थी और फिर उन्हें बुनाई में शामिल किया जाता था। हालांकि, हर कसावु साड़ी में असली सोने-चांदी कीजरी हो, यह जरूरी नहीं है। आज बाजार में धातु के मिश्रण और सिंथेटिक धागों से बने किफायती विकल्प भी उपलब्ध हैं। यही वजह है कि इसकीपा Read more...

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मल्टीविटामिन से लेकर इम्यूनिटी गमीज़ तक, कहीं आप भी तो नहीं ले रहे जरूरत से ज्यादा जिंक? जानिए 5 बड़े खतरे

आजकल सेहत को दुरुस्त रखने के लिए लोग मल्टीविटामिन, इम्यूनिटी गमीज़, बालों की मजबूती के सप्लीमेंट्स और गले की खराश के लिए जिंकवाली गोलियां लेने लगे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन सभी चीजों को एक साथ लेने पर शरीर में जिंक की मात्रा कितनी हो जाती है? दरअसल, अलग-अलग सप्लीमेंट्स में मौजूद जिंक की कुल मात्रा अनजाने में सुरक्षित सीमा से अधिक हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जरूरत सेज्यादा जिंक लेने से शरीर को फायदा होने के बजाय कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

कितना जिंक जरूरी है और कब बढ़ जाता है खतरा? जिंक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता, घाव भरने और सामान्य कोशिकीय कार्यों के लिए जरूरीमिनरल है। अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) के अनुसार, वयस्क पुरुषों को प्रतिदिन 11 मिलीग्राम और महिलाओं को 8 मिलीग्रामजिंक की जरूरत होती है। वयस्कों के लिए इसकी अधिकतम सहनीय सीमा भोजन और सप्लीमेंट्स मिलाकर 40 मिलीग्राम प्रतिदिन है। Read more...

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प्रोटीन खाने के बाद लंबे समय तक क्यों नहीं लगती भूख? जानिए कैसे यह वजन और बीमारियों को रोकने में है मददगार

वजन कम करना हो या फिट रहना, डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने की सलाह हमेशा दी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कार्ब्स या फैट की तुलना में हाई-प्रोटीन भोजन करने के बाद पेट लंबे समय तक भरा हुआ (तृप्त) क्यों महसूस होता है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पोषण वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके पीछे पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली, हार्मोनल बदलाव और शरीर का मेटाबॉलिक रिस्पॉन्स मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। पर्याप्त प्रोटीन न केवल अवांछित भूख को रोकता है, बल्कि कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी बचाव करता है।
प्रोटीन लंबे समय तक पेट भरा क्यों रखता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रोटीन के सेवन से शरीर में कई जैविक बदलाव होते हैं जो भूख को शांत रखने में मदद करते हैं:
  • धीमी पाचन प्रक्रिया: कार्बोहाइड्रेट की तुलना में प्रोटीन को टूटने और पचने में अधिक समय लगता है। यह पेट के खाली होने की गति (Gastric Emptying) को धीमा कर देता है, जिससे भोजन के बाद लंबे समय तक भूख का अहसास Read more...

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शादी में थोड़ी दूरी ला सकती है नज़दीकियां: जापानी अवधारणा 'मा' (Ma) सिखाती है रिश्तों में पर्सनल स्पेस का महत्व

वैवाहिक जीवन को अक्सर लगातार साथ रहने, साझा दिनचर्या और एक-दूसरे के साथ अधिक से अधिक समय बिताने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, जापानी संस्कृति की एक अनोखी अवधारणा 'मा' (Ma) का मानना है कि शादीशुदा रिश्ते में जानबूझकर दिया गया 'पर्सनल स्पेस' (निजी दायरा) पार्टनर्स को अलग करने के बजाय उनके भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा बना सकता है।
क्या है जापानी अवधारणा 'मा'?
जापानी संस्कृति में 'मा' का अर्थ एक जानबूझकर बनाए गए अंतराल, खाली जगह या ठहराव से है। रिश्ते के संदर्भ में इसका अर्थ साथी की उपेक्षा करना या उनसे भावनात्मक दूरी बनाना नहीं है, बल्कि दोनों व्यक्तियों को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए सांस लेने की पर्याप्त जगह देना है।
पश्चिमी और पारंपरिक मान्यताओं में जहां 'दो जिस्म एक जान' की बात की जाती है, वहीं 'मा' यह सिखाता है कि रिश्ते की मजबूती के लिए दोनों व्यक्तियों का अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
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बंदर और लंगूर में क्या है अंतर? जानें इनकी पहचान, खानपान और सामने आने पर बरतने वाली सावधानियां


रिहायशी बस्तियों, बाजारों या जंगलों के किनारे पेड़ों पर प्राइमेट्स दिखना आम बात है, लेकिन अधिकतर लोग हर ऐसे जानवर को सिर्फ 'बंदर' कहकर बुलाते हैं। यद्यपि जैविक रूप से लंगूर भी बंदरों के परिवार का ही हिस्सा हैं, लेकिन बोलचाल में बंदर शब्द आमतौर पर 'मकाक' (लाल मुंह वाले रीसस बंदर) के लिए इस्तेमाल होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बंदर और लंगूर के शारीरिक बनावट, खानपान और बर्ताव में कई बड़े फर्क होते हैं।
दोनों को पहचानने के आसान तरीके
डीसीसी एनिमल हॉस्पिटल एंड पेटकेयर (गुरुग्राम) के पशु चिकित्सा निदेशक डॉ. विनोद शर्मा के अनुसार, शारीरिक विशेषताओं पर ध्यान देकर दोनों को आसानी से पहचाना जा सकता है:
  • चेहरा और रंग रूप: बंदरों का चेहरा आमतौर पर हल्का गुलाबी या भूरे रंग का होता है और शरीर पर भूरे बाल होते हैं। इसके विपरीत लंगूर का चेहरा बिल्कुल काला और शरीर पर हल्के ग्रे (सलेटी) रंग के बाल होते हैं।
  • शारीरिक कद-काठी: बंदर का शरीर छोटा, गठी Read more...

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